धारा 370 और कश्मीर (ताटंक छंद =16+14)
छलावरण था तीन सौ सत्तर, काश्मीर अब मुक्त हुआ.
भारत अंश आज भारत से, पूर्ण रूप संयुक्त हुआ.
खूब सियासी रोटी सेंकी, धूर्त सियासतदानों ने.
ख़त्म हुआ इनका यह खेला, मिलेंगे पागलखानों में.
अपने होकर किन्तु तुम्ही ने, अपनों पर पत्थर बरसाया.
दुश्मन देश पाक की शह पर, उसका झंडा लहराया.
खाया नमक देश का लेकिन, पाक पाक तुम चिल्लाये.
फिर भी मुश्किल लम्हों में, हम ही तुम्हारे काम आये.
वह भिखमंगता तुम्हें क्या देगा, मांग मांग खुद खाता है.
पिछलग्गू है चीन का कायर, हमको आंख दिखाता है.
सिर्फ तुम्हारी खातिर जन्नत, माँओं ने लाल गवाया है.
अपनी ओछी जिद से तुमने, भारत माँ को रुलाया है.
तुम बिन भारत अगर अधूरा, भारत बिना नहीं तुम भी.
देह बिना है साँस अधूरी, साँस बिना नहीं तन भी.
आतंक और अलगाववाद को, इसकी दूषित सोंचो को.
पाक परस्ती छोड़ो प्यारे, छोड़ो ओछे तुच्छों को.
कश्मीरी आवाम एक स्वर, भारत होना स्वीकार करो.
भाई चारा प्यार बढ़ाओ, भारत का जयकार करो.
मुश्किल घड़ियाँ बीत चुकी हैं, नया सूर्य उग आया है.
आओ मिलकर साथ चले हम, भारत माँ ने बुलाया है.
खुली हवा में सांसे लेगा, हर कश्मीरी भाई अब.
आओ आकर गले मिले हम, लम्बी हुई जुदाई अब.
कश्मीरी बहनों का पूरा, अब वो पुराना सपना होगा.
भारत पहले से था उनका, काश्मीर भी अपना होगा.
किसी जायरा के सपने अब, हरगिज कत्ल नहीं होंगे।
राष्ट्रभक्त औरंगजेब अब, असमय मृतक नहीं होंगे।
काश्मीर की माटी से पैदा बुरहान नहीं होगा.
भारत माँ का अंचल, इनसे लहूलुहान नहीं होगा.
अब्दुल हमीद सा बांका, घाटी की माटी जन्मेगी.
अब्दुल कलाम से पूतों से, अब ये वादी महकेगी.
हर जर्रा अब भारत होगा, काश्मीर की घाटी का.
काश्मीर भी गर्व से बोले, मैं हिन्दुस्तानी माटी का.
रचनाकार- विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी 'विनय'
शोध छात्र - रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर (म. प्र.)