Wednesday, 22 July 2020

लाचारी (गजल)

विज्ञान भी लाचार है, धर्म भी खामोश है।
ये कयामत की घड़ी, हर बशर में खौफ है।
खुश हवा सजरो दरख्त ये परिंदे जानवर।
बस महज इंसान ही, गमजदां बेहोश है।
ये तरक्की वो हुनर, ध्वस्त हैं ईजाद सब।
एक कुदरत का कहर जलवा फरोश है।
रुक गयी सी ये जमीं आसमां दुनिया मनो।
क्या यही इंसानियत के खात्मे का पोश है?
वक्त का है ये तकाज़ा रुक के थोड़ा सोच ले।
है सुधरना या हमें अब होना जमींदोज है।

अर्थ:-
बशर - मनुष्य
सजरो दरख्त - पेड़ पौधे
परिंदे - पक्षी
गमजदां - दुख में डूबा हुआ
हुनर - कौशल
ईजाद - नयी खोज
कुदरत - प्रकृति
जलवा फरोश (बेचना) - छटा बिखरना
पोश - छिपा होना
तकाज़ा - मांग, दावा
जमींदोज - जमीन में दफ्न होना, मिट्टी में मिलना

©विन्ध्येश्वरी

Tuesday, 14 July 2020

बाल मुस्कान (घनाक्षरी छंद)

हरे भरे बाग बीच, फूल एक ज्यों नवीन,
कोमल अमल पंख, वो मंद मंद खोलते।
बाल भगवान याकि, संत निर अभिमान,
शिव जोगी ध्यान धरे, कार कैलाश पे॥
शब्द वाक्य छंद वाक चातुरी न आये तुझे,
रसना न बोलती है, नैन तेरे बोलते। 
कोटि कोटि कामदेव, कोटि देव तैंतीस औ,
मेरी जान कुरबान, तेरी प्यारी मुस्कान पे॥

©विन्ध्येश्वरी