Tuesday, 26 December 2017

ये पूनम रात मतवाली (मुक्तक - विधाता छंद)

ये पूनम रात मतवाली, उधर चंदा इधर तुम हो।
छलकता है नदी यौवन, उधर चंदा इधर तुम हो।
हवेली क्यों पड़ी सूनी, तुम्हारे दिल की ऐ जाना।
है क्यों खामोशियां पसरी, उधर चंदा इधर तुम हो।

अगन चंदा में लगती जब, सिमटता जा के बादल में।
विरह की वेदना भड़के, बिना साजन मेरे मन में।
नदी का नीर ठंडा पर, तपन तन की नहीं बुझती।
गया है छोड़ छलिया जब, मुझे इस बार सावन में।

क्षितिज में चांद शरमाता, लिपट बादल के दामन में।
कड़कती जोर से बिजुरी, लिपटती पी से आंगन में।
मगर अफसोस सूना है, बिना उनके महल मन का।
लगे पतझड़ सा फैला है, मेरे यौवन कि जीवन में।

©विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी 'विनय'

No comments:

Post a Comment