Monday, 2 September 2019

फर्जी खुदा (गजल)

खुदा खुद को समझने की, बड़ी वो भूल कर बैठा।
जरा सी क्या मिली ताकत, बहुत मगरूर बन बैठा।

सलीका दोस्ती इज्जत, शराफत कुछ नहीं उसमें।
है इंसा वो भी माटी का, हकीकत भूल कर बैठा।

सबक सबको सिखा देता, समय बलवान है साहब।
बहुत पुरजोर तू लेकिन, अभी कमजोर बन बैठा।

खुदा ने हुश्न क्या बख्शा, जरा सी क्या अदा दे दी?
हमारे इश्क की अर्जी, वो नामंजूर कर बैठा।

गमों से दिल लबालब है, लबों पे मुस्कुराहट है।
इसी चक्कर में अपना मैं, जिगर नासूर कर बैठा।

अरे वो बाज जैसा था, हवा से होड़ लेता था।
नजाकत वक्त की बदली, हवा माकूल हो बैठा।

हमारे इश्क उसके जुल्म की ये इंतहां देखो।
कि अश्के गम मेरा उसके, लबों का फूल बन बैठा।

©विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी

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