Saturday, 24 August 2019

शून्य

शून्यता ने घेर रखा, है मुझे हर ओर से
चाहता हूँ दूर जाना, बंध बेड़ी तोड़कर।
है चिरंतन सत्य जग, भागता जो शून्य से
घेरता उतना उसे यह, मार्ग में अवरोध कर।

जोड़ कर सब शून्यताएं, रच रहा अंकावली
देखता जब ध्यान से, तो हर तरफ ही शून्य है।
इस भंवर में फंस गया जब, शून्य मुझसे पूछता
दंभ क्यों सर्वस्व का है, तू स्वयं में शून्य है।

शून्यवत संसृति सकल है, शून्य अवयव हैं सभी
शून्यता से जन्म अपना, अंत उसमें लीन है।
शून्य से तू मित्रवत हो, शून्य का अभिसार कर।
शून्य ही तो ईश शाश्वत, शून्य महामीन है।

©विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी 'विनय'

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