मैं दृढ़व्रती भीष्म
पड़ा व्यथित शर- शैय्या पर
सोंच रहा हूँ
अपने संकल्पित व्रत को
बंधा रहा जिससे मैं
आजन्म!
किन्तु मिला क्या?
भातृ संग में पक्षपात
नारी का मान- हरण
कुरुक्षेत्र के समरांगण में
रक्त- पिपासु तलवारें
गर्वोन्नत भीम- गदा
टंकारित गाण्डीव
और अंत में
वीरवरों की लथपथ लाशें
क्रंदन!
चीख!
पुकार!
नववधुओं का विलाप
माताओं का करुण- क्रंदन
गूंज रही हैं मेरे कानों में
अब भी
देख रहा हूँ
तिलतिल टुटते उस सिंहासन को
जिसकी खातिर मैंने उत्सर्ग किया निज
देख रहा हूँ
खंड- खंड होते भारत को
देख रहा हूँ
अपने कुल का मैं विनाश
क्या मैं ही हेतु नहीं इसका ?
शायद हाँ!
पर डरता हूँ सच से
क्योंकि चुभता है वो
पर कह सकता हूँ
यह व्रत है उत्तरदायी इसका
इस व्रत से क्या पाया मैंने?
सब कुछ खोया है
हाँ! सब कुछ खोया है।
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