Sunday, 31 December 2017

अगर जिद ठान ले कोई (मुक्तक - विधाता छंद)

हमारे गम हमें यारों, नहीं उतना सतायेंगे।
किसी दिन वो खुशी अपनी, मनाना भूल जायेंगे।
बुरा है वक्त ये मेरा, कि मारो खूब सब पत्थर।
कभी कदमों तले अपने, ये पर्वत लेट जायेंगे।

नहीं देखो हमारा गम, हमें कितना सताता है।
उसे देखो खुशी कैसे, मनाना भूल जाता है।
बहुत मगरूर है यारों, समय की चाल न समझे।
अकड़ के बात करता है, मुकर के भाग जाता है।

नहीं ये मांगता तुम से, मुझे अपना पता दे दो।
नहीं ये आरजू  मेरी, दुआ दे दो वफा दे दो।
न मांगू चांद तारे या, जहां भर की खुशी मांगू।
मेरे कातिल मुझे मेरा, वही टूटा जिया दे दो।

अगर गम कह न पाऊं मैं, नहीं क्या गम सही मेरा।
उसे कातिल न बोलूं मैं, तो क्या कातिल नहीं मेरा।
अगर कातिल है वो सच में, तो सच से रूबरू होगा।
सचाई झूठ का निर्णय, करेगा वक्त ही मेरा।

किसी की भावना आहत, किसी को चोट लगती है।
किसी का टूटता दिल तो, किसी की आंख बहती है।
कई मायूस हो जाते, कई मुंह फेर लेते हैं।
सचाई चीखकर अपनी, सही जब बात कहती है।

अगर जिद ठान ले कोई, तो कुछ मुश्किल नहीं होता।
लगन जिद औ समर्पण बिन, फतह हासिल नहीं होता।
कहे दुनिया गलत तुमको, सही करके दिखा देना।
बिना छैनी लगे पत्थर, खुदा काबिल नहीं होता।

अगर हो मुश्किलें पथ में, तो मंजिल तय फतह होना।
मगर भयभीत हो इनसे, न साहस धैर्य को खोना।
बड़ी हो मुश्किलें जितनी, सफलता भी बड़ी उतनी।
धधकती आग में तपकर, निकलता है खरा सोना।

©विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी 'विनय'

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