Thursday, 15 September 2016

आभासी रिश्ते (पद)

आभासी रिश्ते कब तक टिकते हैं? 
कब तक जीयें स्वप्न लोक में, स्वप्न सदा ही टुटते हैं॥ 
आज जुड़े परवान चढ़े कल, परसों तक ये कब रहते हैं? 
इन रिश्तों में उलझ- उलझ कर, अपना व्यर्थ समय करते हैं॥ 
सबका अपना जीवन होता, अपने विधि से सब जीते हैं। 
निजी क्षेत्र में कभी किसी के, नहीं भूल कर भी घुसते हैं॥ 
उनकी अपनी सुन्दर दुनिया, जिसमें वे नित खुश रहते हैं। 
बनकर राहु सूर्य की खुशियां, आखिर हम क्यों ग्रसते हैं? 
आज मिला यह ज्ञान मुझे, "अपने हद में ही रहते हैं। 
कितना ही आत्मिय हो कोई, पार नहीं निज हद करते हैं॥ 
अपना आपा खो सकता है, उसके हद को जब छूते हैं। 
अपना है सम्मान इसी में, उससे दूर स्वतः रहते हैं॥

कोई अपना सा हो (गजल)


प्रिय मित्रों! एक गजलनुमा रचना लिखने का प्रयास है शायद ये किसी बह्र में न हो , फिर भी इस रचना के संदर्भ में आपकी महत्वपूर्ण प्रतिक्रियाएं अपेक्षित हैं-
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मात्रा विन्यास-
222 222 222 222 2

कोई अपना सा हो जिससे अपनी बातें हों।
कुछ दिल की बातें हों सुख दुख की बातें हों॥
आओ चलकर नदिया तट पर कुछ पल बैठे हम।
प्यार मुहब्बत उल्फत की रूमानी बातें हो॥
पूरनमासी रात सुहानी सब नीरव नीरव है।
आ बैठे खामोशी में रूहानी बातें हों॥
रात कि रानी की गलियों में रातें रंगी हैं।
रानी के मन सिसक रही वीरानी बातें हों॥
अच्छी लगती हैं बातें जो निश्छल होती हैं।
माँ की घुड़की या शिशु की बचकानी बातें हों॥
मानव अपनी मानवता को ऐसे भूल गया।
सत्य अहिंसा दया धर्म सब बेमानी बातें हों॥

अब तेरा परदे में छुपना मुश्किल है (गजल)


अब तेरा परदे में छुपना मुश्किल है।
अपने आगे दरपन रखना मुश्किल है॥
तुमने मुझको इतना डरा दिया मालिक।
अब मेरा तुमसे कुछ डरना मुश्किल है॥
सुख के सौदागर यां हर सूं बसते हैं।
हंसी खुशी से मेरा रहना मुश्किल है॥
हर कोई अपना दो चेहरा रखता है।
जो है अंदर बाहर दिखना मुश्किल है॥
मन माफिक मैं सच्चा ढूढूं मीत कोई।
बाजारू दुनिया में मिलना मुश्किल है॥
रिश्तों का जीवन अब धन तय करते हैं।
क्या बिन धन के रिश्ता निभना मुश्किल है?
ठान लिया हूं चलना मंजिल पाने तक।
अवरोधों से मेरा रुकना मुश्किल है॥
इतना रोये अब तक आंसूं सूख गये।
तेरे गम में आंसू गिरना मुश्किल है॥
ठोकर खाकर जान गया हूं दुनिया को।
झूठे जज्बातों में बहना मुश्किल है॥
बड़े मियां तुम सच्चे मैं तो झूठा हूं।
हूं छोटा तो झूठा वरना मुश्किल है॥

प्रेम का अर्थ (गजल)


प्रेम का अर्थ उनको समझ आ गया।
रंग उल्फत का शायद उन्हें भा गया॥
तंज कसते थे अब तक मेरी आशिकी पे।
अब उन्हें आशिकी में मजा आ गया॥
बहकी बहकी जुबां है कदम लड़खड़ा।
एक कतरा पिया औ नशा छा गया॥
अपनी सूरत पे है बदगुमां चांदनी।
सारी दुनिया का सूरत है बख्शा गया॥
फूटी किस्मत पे मेरे जो हंसते रहे हैं।
अपनी किस्मत पे रोना उन्हें आ गया॥

ठगे गये हम लोग (रोला गीत)



बनते संत महान, काम घटिया ही करते।
खोले धर्म दुकान, कर्म बनिया के करते॥
उनसे लेकर मंत्र, हृदय विह्वल हो रोया।
ठगे गये हम लोग, देख अपनापन खोया॥

छोड़ो माया मोह, नित्य हमको समझाया।
कब्जाकर पर भूमि, आश्रम निज बनवाया।
शैम्पू साबून तेल, बेंचते संत वणिक या।
ठगे गये हम लोग, देख अपनापन खोया॥

चमत्कार बहु भांति, भांति अनुभव करवाते।
भूले सारा ज्ञान, जेल अपवित्र बताते॥
परम संत क्या जेल, पलंग जंगल हो या?
ठगे गये हम लोग, देख अपनापन खोया॥

एक दिवस प्रण ठान, संत जंगल में बैठे।
लायेगा करतार, साधना के बल ऐंठे॥
कहाँ गया वो तेज, आज तू कारा सोया?
ठगे गये हम लोग, देख अपनापन खोया॥

किस पर हो विश्वास, जगत ठग से बोझिल है।
सदमार्ग बताता संत, किन्तु छल में शामिल है॥
जप तप व्रत औ ध्यान, लगे जीवन ही खोया।
ठगे गये हम लोग, देख अपनापन खोया॥

भीष्म प्रतिज्ञा (छंद मुक्त कविता)


मैं दृढ़व्रती भीष्म
पड़ा व्यथित शर- शैय्या पर
सोंच रहा हूँ
अपने संकल्पित व्रत को
बंधा रहा जिससे मैं
आजन्म!
किन्तु मिला क्या?
भातृ संग में पक्षपात
नारी का मान- हरण
कुरुक्षेत्र के समरांगण में
रक्त- पिपासु तलवारें
गर्वोन्नत भीम- गदा
टंकारित गाण्डीव
और अंत में
वीरवरों की लथपथ लाशें
क्रंदन!
चीख!
पुकार!
नववधुओं का विलाप
माताओं का करुण- क्रंदन
गूंज रही हैं मेरे कानों में
अब भी
देख रहा हूँ
तिलतिल टुटते उस सिंहासन को
जिसकी खातिर मैंने उत्सर्ग किया निज
देख रहा हूँ
खंड- खंड होते भारत को
देख रहा हूँ
अपने कुल का मैं विनाश
क्या मैं ही हेतु नहीं इसका ?
शायद हाँ!
पर डरता हूँ सच से
क्योंकि चुभता है वो
पर कह सकता हूँ
यह व्रत है उत्तरदायी इसका
इस व्रत से क्या पाया मैंने?
सब कुछ खोया है
हाँ! सब कुछ खोया है।