शब्द नीड़
Monday, 15 March 2021
मेरा लिखना
वो जो मुझसे लिखवाता है वही लिखता हूँ ॥
मैं यह नहीं कहता कि गलत नहीं लिखता हूँ।
बस मैं अपना पूरा सही सही लिखता हूँ॥
लोग समझे न समझे मुझे कोई गिला नहीं।
वो समझता है इसलिये वही लिखता हूँ॥
कल और कल की फिक्र दुनिया करती है।
मैं अब तो बस अभी को अभी लिखता हूँ॥
ये लफ्ज ये हर्फ ये कहन मेरे अपने नहीं हैं।
वो जो इन सब में है बस वही लिखता हूँ॥
©विन्ध्येश्वरी
Monday, 14 December 2020
जीने का हुनर (गजल)
Tuesday, 6 October 2020
सागर से जैसे मय छलके (गजल)
अपनी आग को जिंदा रखना
Tuesday, 4 August 2020
शेर और गाना
जिंदगी तू इक अजब राज है,
कितना अनूठा तेरा अंदाज है।
समझ में न आये क्या कह रही है,
ऐसा ही तेरा कुछ अल्फाज है॥
गाना-1-1
जिन्दगी में अपने पराये हुए हैं,
हम हर तरफ जख्म खाये हुए हैं।
शेर-2
जख्मों पे मेरे मरहम न दे,
जख्मों की दवा हम खुद कर रहे हैं।
मिला नहीं कोई अच्छा सा मरहम,
इसलिये हम आंसू लगा रहे हैं॥
गाना-1-2
इक हमदर्द आप ही थे मेरे,
आप लब पे हंसी कुछ दबाये हुए हैं॥
शेर-3
किसलिए हंसते हो क्या बात है?
होंठों में हंसी का क्या राज है?
अरे ये तो बता दो मेरे मरने से पहले,
क्या तुम्हें वो पहली मुलाक़ात याद है?
गाना-2-1
तुम मेरे पास थे तो बड़ी रौशनी थी,
चांद सूरज सितारे और चांदी थी।
शेर-4
तेरी बेवफाई का किससे गिला करूं,
तन्हाई में तेरी यादों से मिला करूं।
तू कहे तो मैं ये दुनिया जला दूं,
वरना जुदाई में खुद ही जला करूं॥
गाना-2-2
ये क्या हुआ बेवफा तुम हुए,
अब चरागे शमा सब बुझाये हुए हैं॥
शेर-5
हमारी याद तुम्हें यूं सताया करेगी,
आंख की किरकिरी तड़पाया करेगी।
उठेगी जलन और गिरेंगे आंसू,
बादल से बिजली गिराया करेगी॥
गाना-3-1
तुम थे गुलशन गुलजार था,
फिजां में शमा थी अतहार था।
शेर-6
कागजी फूलों में खुशबु नहीं है,
बेवफा के आंखों में आंसूं नहीं है।
दिख रही है जो आंखों में थोड़ी सी नमी,
काजल की हंसी है महजूं नहीं है॥
गाना-3-2
चमन में अगन तुम लगाकर चले,
अब फूलो कली मुरझाये हुए हैं॥
शेर-7
आंसूं गिरा के चेहरा क्यों खराब करते हो,
आंखों की रोशनी क्यों खराब करते हो।
घड़ियाली आंसूं अच्छे नहीं होते,
आंसुओं की कीमत क्यों खराब करते हो॥
गाना-4-1
तुम मुझसे वफा तो निभा न सके,
ख्वाबों में भी अपना बना न सके।
शेर-8
वफा, इश्क, मोहब्बत, सब बेमानी है,
मेरा कातिल बेवफा खानदानी है।
उसने खुद ही कहा है कि उसका प्यार,
बनावटी, कागजी और जबानी है॥
गाना-4-2
अरे बेरहम क्या मरकर मिलोगे,
इस जनम में अगर न हमारे हुए॥
शेर-9
दफना के वो यूं मुझे जा रहे हैं,
दुनिया की दौलत लिये जा रहे हैं।
माना हूँ मुफलिस है तंगी गरीबी,
हम मुहब्बत की दौलत लिये जा रहे हैं॥
गाना-5-1
कदमों से ठोकर हमें अब लगा दो,
आंचल का कफन मुझ पे ओढ़ा दो।
शेर-10
मुझे गुल गुलाब गुलशन न देना,
परियों की सोहबत औ जन्नत न देना।
हो सके तो दुप्पटे का कफन ओढ़ा दो,
मेरी मैय्यत पे दो गज कफन न देना॥
गाना-5-2
आखिरी आरजू है इसको तोड़ो नहीं,
मेरी मैय्यत पे अगर आप आये हुए हैं॥
©विन्ध्येश्वरी
Wednesday, 22 July 2020
लाचारी (गजल)
ये कयामत की घड़ी, हर बशर में खौफ है।
खुश हवा सजरो दरख्त ये परिंदे जानवर।
बस महज इंसान ही, गमजदां बेहोश है।
ये तरक्की वो हुनर, ध्वस्त हैं ईजाद सब।
एक कुदरत का कहर जलवा फरोश है।
रुक गयी सी ये जमीं आसमां दुनिया मनो।
क्या यही इंसानियत के खात्मे का पोश है?
वक्त का है ये तकाज़ा रुक के थोड़ा सोच ले।
है सुधरना या हमें अब होना जमींदोज है।
अर्थ:-
बशर - मनुष्य
सजरो दरख्त - पेड़ पौधे
परिंदे - पक्षी
गमजदां - दुख में डूबा हुआ
हुनर - कौशल
ईजाद - नयी खोज
कुदरत - प्रकृति
जलवा फरोश (बेचना) - छटा बिखरना
पोश - छिपा होना
तकाज़ा - मांग, दावा
जमींदोज - जमीन में दफ्न होना, मिट्टी में मिलना
©विन्ध्येश्वरी
Tuesday, 14 July 2020
बाल मुस्कान (घनाक्षरी छंद)
Tuesday, 9 June 2020
अपना अपना दर्द (गजल)
कुछ दर्द तुम्हारा अपना है, कुछ दर्द हमारे अपने हैं।
हम तुमसे पूछे कितना है, तुम हम से पूछो कितने हैं?
तुम अपने गम में खोये हो, हम अपने गम में रोते हैं।
ना तुम हमको समझे हो, ना हम तुमको समझे हैं।
तुम तैर चुके हो जीवन नदिया, हम बीच भंवर में डूब रहे।
तुम ख्वाब सजाना छोड़ चुके, हम देख रहे कुछ सपने हैं।
हालात बदलना चाहे हम, तुम अपने हाल में जीते हो।
तुम अपने हाल में जलते हो, हम अपनी जिद में जलते हैं।
पांव तुम्हारे डगमग डगमग, हम पांव जमाना चाह रहे।
इक मुश्किल कोशिश जारी है, मरना है या मिलने हैं।
हैं हार रहे हम दोनों ही, इस जीवन चौसर की बाजी।
कुछ गड़बड़ बाजी तेरी थी, कुछ उल्टे पांसे मेरे हैं।
हम दर्द तुम्हारा ले न सके, तुम साथ हमारा छोड़ चुके।
कुछ शिकवा हमको तुमसे है, कुछ तुमको हमसे शिकवे हैं।
©विन्ध्येश्वरी
Monday, 2 September 2019
फर्जी खुदा (गजल)
खुदा खुद को समझने की, बड़ी वो भूल कर बैठा।
जरा सी क्या मिली ताकत, बहुत मगरूर बन बैठा।
सलीका दोस्ती इज्जत, शराफत कुछ नहीं उसमें।
है इंसा वो भी माटी का, हकीकत भूल कर बैठा।
सबक सबको सिखा देता, समय बलवान है साहब।
बहुत पुरजोर तू लेकिन, अभी कमजोर बन बैठा।
खुदा ने हुश्न क्या बख्शा, जरा सी क्या अदा दे दी?
हमारे इश्क की अर्जी, वो नामंजूर कर बैठा।
गमों से दिल लबालब है, लबों पे मुस्कुराहट है।
इसी चक्कर में अपना मैं, जिगर नासूर कर बैठा।
अरे वो बाज जैसा था, हवा से होड़ लेता था।
नजाकत वक्त की बदली, हवा माकूल हो बैठा।
हमारे इश्क उसके जुल्म की ये इंतहां देखो।
कि अश्के गम मेरा उसके, लबों का फूल बन बैठा।
©विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी
नाराजगी (गजल)
अगर नाराज हो जाना, वजह मुझको बता देना।
खताएं हो गयीं मुझसे, जो मन चाहे सजा देना।
बुरा मैं हूँ कमीना हूँ, मगर तुम मोम जैसे हो।
अगर ये हो सके तुमसे, गुनाहों को भुला देना।
तुम्हारे बिन अधूरा हूँ, मेरी तस्वीर बाकी है।
हसीं रंग दे के अपना तुम, इसे पूरा बना देना।
मुहब्बत जैसी चीजों से, तुम्हारा दिल जो भर जाये।
हमारे
©विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी 'विनय'