Monday, 14 December 2020

जीने का हुनर (गजल)

मुझमें अजब सा शरर आ गया।
अचानक जब वो नजर आ गया॥
जिसे भी पीने का हुनर आ गया।
समझो जीने का हुनर आ गया॥
बहुत हो चुका शबे गम और आंसू।
बुझा दो चराग अब सहर आ गया॥
अजी क्या है इन गिले शिकवो में।
छोड़ो भी उम्र का असर आ गया॥
जिंदगी बड़ी आसान हो गयी है।
जबसे हंसने का हुनर आ गया॥
जरा ठहरो छोड़ो ये भाग दौड़।
अब मैं आजिजे सफर आ गया॥
तख्तो ताज अमानत जागीर सब।
शुकूं के खातिर छोड़कर आ गया॥
क्या दिल्लगी मुसाफिर खाने से।
इम्ताहां दे के मैं अपने घर आ गया॥
दिल ने लफ्जों से यारी की तो।
दुआओं में खुदा का असर आ गया॥

©विन्ध्येश्वरी

शब्दार्थ
1- शरर -चिंगारी, स्फुलिंग, रौनक
2- सहर - सुबह
3- आजिजे सफर - यात्रा से ऊबन
4- अमानत - संपत्ति
5- तख्तो ताज - सिंहासन और मुकुट
6- शुकूं - शांति
7- दिल्लगी - दिल लगाना, हंसी मजाक
8- मुसाफिर खाना - यात्री निवास, सराय
9- लफ्ज़ - शब्द
10 - हुनर - तरीका

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