Tuesday, 27 August 2019

प्रकाश


"न कर इतना उजाला तू, कि आंखें चकमका जायें।
मगर हो रौशनी इतनी, कि दुनिया जगमगा जाये।
ये माना रौशनी जग में, इबारत लिख रही प्रतिपल।
इमारत है बड़ी ऊंची, कहीं ना चरमरा जाये।"

Monday, 26 August 2019

भूल जाओगे (गजल - विधाता छंद)



खुदा देखो अदा उनकी, अदाएं भूल जाओगे।
सदा उनकी सुनोगे सब, सदाएं भूल जाओगे।

तबस्सुम शोखियां लब पर, गिराती बिजलियां सब पर।
गिरेगी बिजलियां तुम पर, दुआएं भूल जाओगे।

जो भूले से भी गुजरोगे, गली उनकी फरिश्तों फिर।
हसीं रंगीन जन्नत की, फिजाएं भूल जाओगे।

अजब मासूमियत उनमें, नजाकत है सदाकत है।
अगर सौ कत्ल भी कर दे, खताएं भूल जाओगे।

©विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी 'विनय'

Sunday, 25 August 2019

गोबर और झुनिया - प्रेम प्रसंग

खड़ा द्वारे रहूँ तेरे, अगर कुछ भीख मिल जाये।
न भटकूं गैर दर पर मैं, यहीं गर पेट भर जाये।
नहीं कुछ पास मेरे है, तुम्हें जो दे सकूं जाना।
करम मुझ पर अगर कर दो, तो ये संसार मिल जाये।

भिखारी बनके आये हो, तो चुटकी भर ही पाओगे।
बिना दस द्वार भटके तुम, तसल्ली ही न पाओगे।
तुम्हारे पास ऐसा धन, धनी जन को नहीं मिलता।
हमें तुम मोल ले लो गर, तो ये संसार पाओगे।

Saturday, 24 August 2019

धारा 370

धारा 370 और कश्मीर (ताटंक छंद =16+14)

छलावरण था तीन सौ सत्तर, काश्मीर अब मुक्त हुआ.
भारत अंश आज भारत से, पूर्ण रूप संयुक्त हुआ.

खूब सियासी रोटी सेंकी, धूर्त सियासतदानों ने.
ख़त्म हुआ इनका यह खेला, मिलेंगे पागलखानों में.

अपने होकर किन्तु तुम्ही ने, अपनों पर पत्थर बरसाया.
दुश्मन देश पाक की शह पर, उसका झंडा लहराया.

खाया नमक देश का लेकिन, पाक पाक तुम चिल्लाये.
फिर भी मुश्किल लम्हों में, हम ही तुम्हारे काम आये.

वह भिखमंगता तुम्हें क्या देगा, मांग मांग खुद खाता है.
पिछलग्गू है चीन का कायर, हमको आंख दिखाता है.

सिर्फ तुम्हारी खातिर जन्नत, माँओं ने लाल गवाया है.
अपनी ओछी जिद से तुमने, भारत माँ को रुलाया है.

तुम बिन भारत अगर अधूरा, भारत बिना नहीं तुम भी.
देह बिना है साँस अधूरी, साँस बिना नहीं तन भी.

आतंक और अलगाववाद को, इसकी दूषित सोंचो को.
पाक परस्ती छोड़ो प्यारे, छोड़ो ओछे तुच्छों को.

कश्मीरी आवाम एक स्वर, भारत होना स्वीकार करो.
भाई चारा प्यार बढ़ाओ, भारत का जयकार करो.

मुश्किल घड़ियाँ बीत चुकी हैं, नया सूर्य उग आया है.
आओ मिलकर साथ चले हम, भारत माँ ने बुलाया है.

खुली हवा में सांसे लेगा, हर कश्मीरी भाई अब.
आओ आकर गले मिले हम, लम्बी हुई जुदाई अब.

कश्मीरी बहनों का पूरा, अब वो पुराना सपना होगा.
भारत पहले से था उनका, काश्मीर भी अपना होगा.

किसी जायरा के सपने अब, हरगिज कत्ल नहीं होंगे।
राष्ट्रभक्त औरंगजेब अब, असमय मृतक नहीं होंगे।

काश्मीर की माटी से पैदा बुरहान नहीं होगा.
भारत माँ का अंचल, इनसे लहूलुहान नहीं होगा.

अब्दुल हमीद सा बांका, घाटी की माटी जन्मेगी.
अब्दुल कलाम से पूतों से, अब ये वादी महकेगी.

हर जर्रा अब भारत होगा, काश्मीर की घाटी का.
काश्मीर भी गर्व से बोले, मैं हिन्दुस्तानी माटी का.

रचनाकार- विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी 'विनय'

शोध छात्र - रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर (म. प्र.)


मोबाइल नंबर - 9565160172

तुम हो (कविता)

जब बजती है कहीं रुनझुन सी पायलिया
जब खनकती हैं कहीं छनछन सी चूड़ियाँ
जब चमकती है कहीं झिलमिल सी बिंदिया
तो लगता है तुम हो।

जब रखता है कोई मेरे कंधे पर हाथ
जब चलता है कोई मेरे साथ साथ
जब करता है कोई मद्धम सी आवाज
तो लगता है तुम हो।

जब खाता हूँ कोई स्वादिष्ट सा खाना
जब सुनता हूँ कोई प्यार भरा गाना
जब पढ़ता हूँ कोई रूमानी अफसाना
तो लगता है तुम हो।

वो मखमली तकिया वो नर्म बिस्तर
जिसमें पड़ा रहता हूँ मैं बेफिकर
उठता हूँ सुबह उसकी सलवटों में लिपटकर
तो लगता है तुम हो।

देखता हूँ सुबह जब सूरज की लाली को
गर्म गर्म चाय की प्याली को
दाल चावल चोखा की थाली को
तो लगता है तुम हो।

कमरे में झाड़ू लगाता हूँ जब
इतवार को कपड़े सफाता हूँ जब
सुबह शाम खाना पकाता हूँ जब
तो लगता है तुम हो।

हर वह घड़ी जो तुमसे जुड़ी है
हर वह चीज जो तुमने छुई है
हर वह बात जो तुमने कही है
सोचता हूँ
तो लगता है तुम हो।

©विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी 'विनय'

बहुत कुछ छूट जाता है (गजल)

बहुत तेजी से चलना मत, पसीना छूट जाता है।
कि दरिया छूट जाता है, सफीना टूट जाता है।

इन्हीं ख्वाबों ने लूटा है, किया बेचैन अरमां ने।
इन्हीं के वास्ते अक्सर, ये जीना छूट जाता है।

सुहाना इक सफर जीवन, यहां दिलकश नजारे हैं।
मगर जद्दोजहद इसकी, नजारा छूट जाता है।

धता किस्मत बता देता, लड़ाई रब से लड़ जाता।
दगा अपनों से मिलने पर, कोई भी टूट जाता है।

बिना ब्याही युवा बेटी, ऋणों का बोझ सिर पर है।
फसल चौपट हुई अबकी, तो दहकां टूट जाता है।

गुनाहों का फरिश्ता वो, सभी ये जानते लेकिन।
सबूतों के बिना हरदम, वो जालिम छूट जाता है।

खुदा ने खुद बनाया है, संवारा रचके उनको है।
उन्हें देखे कोई जब भी, तो आपा छूट जाता है।

है इतने खूबसूरत वो, मगर खुद को नहीं देखा।
हुए वो रुबरू जब भी, तो शीशा टूट जाता है।

गुलों की बात ना करना, गुलों में अनगिनत कांटे।
मिला जब दर्द कांटों से, तो गुलशन छूट जाता है।

1. सफीना - नाव
2. दिलकश - मनोरम, दिल को खुश करने वाला
3. जद्दोजहद - प्रयत्न, चेष्टा, भागदौड़
4. दहकां (दहकान) - किसान

©विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी 'विनय'

गुलों की बात मत करना (गजल)

है कांटों से गुले यारी, गुलों की बात मत करना।
हसीनों का शहर मेरा, वफा की बात मत करना।
दिये हैं जख्म कुछ गुल ने, कुरेदा घाव कुछ ने है।
बुराई ही यहाँ बसती, भले की बात मत करना।
बड़ी मतलब की दुनिया है, कहाँ अपने यहाँ मिलते।
अगर अपना मिले कोई, परायी बात मत करना।
यही वो खंडहर सूना, हुए हम अजनबी दोनों।
न तुम मेरे हुए छोड़ो, पुरानी बात मत करना।
कहो कैसे हो तुम अब तुम्हारी जिंदगी कैसी।
मगर मुझसे नये अपने, सनम की बात मत करना।
नहीं वादा कोई करना, कसम कोई नहीं लेना।
भरोसा उठ चुका इनसे, कसम की बात मत करना।

©विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी 'विनय'

शून्य

शून्यता ने घेर रखा, है मुझे हर ओर से
चाहता हूँ दूर जाना, बंध बेड़ी तोड़कर।
है चिरंतन सत्य जग, भागता जो शून्य से
घेरता उतना उसे यह, मार्ग में अवरोध कर।

जोड़ कर सब शून्यताएं, रच रहा अंकावली
देखता जब ध्यान से, तो हर तरफ ही शून्य है।
इस भंवर में फंस गया जब, शून्य मुझसे पूछता
दंभ क्यों सर्वस्व का है, तू स्वयं में शून्य है।

शून्यवत संसृति सकल है, शून्य अवयव हैं सभी
शून्यता से जन्म अपना, अंत उसमें लीन है।
शून्य से तू मित्रवत हो, शून्य का अभिसार कर।
शून्य ही तो ईश शाश्वत, शून्य महामीन है।

©विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी 'विनय'