Saturday, 24 August 2019

तुम हो (कविता)

जब बजती है कहीं रुनझुन सी पायलिया
जब खनकती हैं कहीं छनछन सी चूड़ियाँ
जब चमकती है कहीं झिलमिल सी बिंदिया
तो लगता है तुम हो।

जब रखता है कोई मेरे कंधे पर हाथ
जब चलता है कोई मेरे साथ साथ
जब करता है कोई मद्धम सी आवाज
तो लगता है तुम हो।

जब खाता हूँ कोई स्वादिष्ट सा खाना
जब सुनता हूँ कोई प्यार भरा गाना
जब पढ़ता हूँ कोई रूमानी अफसाना
तो लगता है तुम हो।

वो मखमली तकिया वो नर्म बिस्तर
जिसमें पड़ा रहता हूँ मैं बेफिकर
उठता हूँ सुबह उसकी सलवटों में लिपटकर
तो लगता है तुम हो।

देखता हूँ सुबह जब सूरज की लाली को
गर्म गर्म चाय की प्याली को
दाल चावल चोखा की थाली को
तो लगता है तुम हो।

कमरे में झाड़ू लगाता हूँ जब
इतवार को कपड़े सफाता हूँ जब
सुबह शाम खाना पकाता हूँ जब
तो लगता है तुम हो।

हर वह घड़ी जो तुमसे जुड़ी है
हर वह चीज जो तुमने छुई है
हर वह बात जो तुमने कही है
सोचता हूँ
तो लगता है तुम हो।

©विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी 'विनय'

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