Monday, 2 September 2019

कभी अपना नहीं माना (गजल)

चलो माना हमें तुमने, कभी अपना नहीं माना।
मगर ये मान लो जाना, कहा दिल का नहीं माना।

शमा ए इश्क में तेरे, मैं जलकर खाक हो जाता।
मगर तुमने कभी हमको, वो परवाना नहीं माना।

मैं खुद को भूल जाऊं , तुम्हीं में डूब जाऊं पर।
बिना मय के जो होता है, वो मयखाना नहीं माना।

हैं ऐसे लोग बहुतेरे, महज अपनी ही कहते हैं।
सुनाओ दर्द उनसे गर, वो गम खाना नहीं माना।

©विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी 'विनय'

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