Monday, 2 September 2019

फर्जी खुदा (गजल)

खुदा खुद को समझने की, बड़ी वो भूल कर बैठा।
जरा सी क्या मिली ताकत, बहुत मगरूर बन बैठा।

सलीका दोस्ती इज्जत, शराफत कुछ नहीं उसमें।
है इंसा वो भी माटी का, हकीकत भूल कर बैठा।

सबक सबको सिखा देता, समय बलवान है साहब।
बहुत पुरजोर तू लेकिन, अभी कमजोर बन बैठा।

खुदा ने हुश्न क्या बख्शा, जरा सी क्या अदा दे दी?
हमारे इश्क की अर्जी, वो नामंजूर कर बैठा।

गमों से दिल लबालब है, लबों पे मुस्कुराहट है।
इसी चक्कर में अपना मैं, जिगर नासूर कर बैठा।

अरे वो बाज जैसा था, हवा से होड़ लेता था।
नजाकत वक्त की बदली, हवा माकूल हो बैठा।

हमारे इश्क उसके जुल्म की ये इंतहां देखो।
कि अश्के गम मेरा उसके, लबों का फूल बन बैठा।

©विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी

नाराजगी (गजल)

अगर नाराज हो जाना, वजह मुझको बता देना।
खताएं हो गयीं मुझसे, जो मन चाहे सजा देना।

बुरा मैं हूँ कमीना हूँ, मगर तुम मोम जैसे हो।
अगर ये हो सके तुमसे, गुनाहों को भुला देना।

तुम्हारे बिन अधूरा हूँ, मेरी तस्वीर बाकी है।
हसीं रंग दे के अपना तुम, इसे पूरा बना देना।

मुहब्बत जैसी चीजों से, तुम्हारा दिल जो भर जाये।
हमारे

©विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी 'विनय'

कभी अपना नहीं माना (गजल)

चलो माना हमें तुमने, कभी अपना नहीं माना।
मगर ये मान लो जाना, कहा दिल का नहीं माना।

शमा ए इश्क में तेरे, मैं जलकर खाक हो जाता।
मगर तुमने कभी हमको, वो परवाना नहीं माना।

मैं खुद को भूल जाऊं , तुम्हीं में डूब जाऊं पर।
बिना मय के जो होता है, वो मयखाना नहीं माना।

हैं ऐसे लोग बहुतेरे, महज अपनी ही कहते हैं।
सुनाओ दर्द उनसे गर, वो गम खाना नहीं माना।

©विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी 'विनय'