आभासी रिश्ते कब तक टिकते हैं?
कब तक जीयें स्वप्न लोक में, स्वप्न सदा ही टुटते हैं॥
आज जुड़े परवान चढ़े कल, परसों तक ये कब रहते हैं?
इन रिश्तों में उलझ- उलझ कर, अपना व्यर्थ समय करते हैं॥
सबका अपना जीवन होता, अपने विधि से सब जीते हैं।
निजी क्षेत्र में कभी किसी के, नहीं भूल कर भी घुसते हैं॥
उनकी अपनी सुन्दर दुनिया, जिसमें वे नित खुश रहते हैं।
बनकर राहु सूर्य की खुशियां, आखिर हम क्यों ग्रसते हैं?
आज मिला यह ज्ञान मुझे, "अपने हद में ही रहते हैं।
कितना ही आत्मिय हो कोई, पार नहीं निज हद करते हैं॥
अपना आपा खो सकता है, उसके हद को जब छूते हैं।
अपना है सम्मान इसी में, उससे दूर स्वतः रहते हैं॥
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