प्रिय मित्रों! एक गजलनुमा रचना लिखने का प्रयास है शायद ये किसी बह्र में न हो , फिर भी इस रचना के संदर्भ में आपकी महत्वपूर्ण प्रतिक्रियाएं अपेक्षित हैं-
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मात्रा विन्यास-
222 222 222 222 2
कोई अपना सा हो जिससे अपनी बातें हों।
कुछ दिल की बातें हों सुख दुख की बातें हों॥
आओ चलकर नदिया तट पर कुछ पल बैठे हम।
प्यार मुहब्बत उल्फत की रूमानी बातें हो॥
पूरनमासी रात सुहानी सब नीरव नीरव है।
आ बैठे खामोशी में रूहानी बातें हों॥
रात कि रानी की गलियों में रातें रंगी हैं।
रानी के मन सिसक रही वीरानी बातें हों॥
अच्छी लगती हैं बातें जो निश्छल होती हैं।
माँ की घुड़की या शिशु की बचकानी बातें हों॥
मानव अपनी मानवता को ऐसे भूल गया।
सत्य अहिंसा दया धर्म सब बेमानी बातें हों॥
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