नहीं वो स्वर्ग की देवी, नहीं वो मूर्ति मंदिर की।
नहीं वो कल्पना कवि की, नहीं वो स्वप्न सुंदर की
नहीं देखा नहीं जाना, सुना भी है नहीं जिसको।
मेरी कविता में वर्णन है, उसी मनमीत प्रियवर की।
बलाएं आपकी हर लूं, सजा कर आरती कर दूँ।
निछावर प्रेम से सारे, जहां की हर खुशी कर दूँ।
बसो मन में मेरे आकर, यूं ही साज सजकर तुम।
मेरे मनमीत तुम पर मैं, समर्पित जिंदगी कर दूँ।
अगर नखशिख करूँ वर्णन, नजर उसको न लग जाये।
है ऐसी दिव्य सूरत ये, कि उस पर क्या कहा जाये।
जला खुद को बना काजल, लगा दूं होठ के नीचे।
मेरा मनमीत शायद फिर, बुरी नजरों से बच जाये।
नहीं वो कल्पना कवि की, नहीं वो स्वप्न सुंदर की
नहीं देखा नहीं जाना, सुना भी है नहीं जिसको।
मेरी कविता में वर्णन है, उसी मनमीत प्रियवर की।
बलाएं आपकी हर लूं, सजा कर आरती कर दूँ।
निछावर प्रेम से सारे, जहां की हर खुशी कर दूँ।
बसो मन में मेरे आकर, यूं ही साज सजकर तुम।
मेरे मनमीत तुम पर मैं, समर्पित जिंदगी कर दूँ।
अगर नखशिख करूँ वर्णन, नजर उसको न लग जाये।
है ऐसी दिव्य सूरत ये, कि उस पर क्या कहा जाये।
जला खुद को बना काजल, लगा दूं होठ के नीचे।
मेरा मनमीत शायद फिर, बुरी नजरों से बच जाये।
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